आत्ममंथन करने का अवसर है:- बिहार दिवस, रामरतन प्रसाद सिंह रत्नाकर

आत्ममंथन करने का अवसर है:- बिहार दिवस, रामरतन प्रसाद सिंह रत्नाकर


विप्र.

नवादा (रवीन्द्र नाथ भैया) 

बिहार भारत के सांस्कृतिक इतिहास का लीलाभूमि रहा है। इस भूभाग पर शासन करने वाले अधिकांश राजा सत्य अहिंसा और प्रजापालन को अपना धर्म माना है। रामायण काल में मिथिला के राजा जनक ने सुखाड़ पड़ने पर हल जोता था। ढ़ाई बार हल जोतने पर सीता निकली थी।

आज भी किसान हरमंतर के नाम से ढ़ाई रेखा खेत जोत कर सीता प्राप्त करने की भावना रखते हैं। यह लांगल पद्धति है। बिहार के किसान पुरुषार्थी माने जाते हैं।

महाभारत काल में पुराणों के अनुसार व्रहदर्थ के पुत्र महाराज जरासंध प्रतापी वैदिक धर्म मानने वाले प्रजा पालक राजा हुए और ज्ञानी लोगों को भी खेती करने का संदेश दिया था। कृषि कला एवं अन्य विभागों में महत्वपूर्ण योगदान के लिए राज्य दरबार में बुलाकर सम्मानित करने का वृतांत ग्रंथों में है। 

सबसे बड़ी बात है कि इस वंश के जरासंध सहदेव से लेकर रिपुंजय तक 40 राजा हुए और कुल 940 साल तक शासन किया। लेकिन राजा होने के लिए कभी युद्ध नहीं हुआ।

ईसा पूर्व  236 से 277 में मौर्य वंश के प्रतापी राजा अशोक मगध के अत्यंत तेजस्वी, साहसी शासक हुए। 

कलिंग युद्ध के व्यापक जनसंहार ने अशोक को पश्चाताप के सागर में डुबो दिया और बौद्ध धर्म की सादगी से प्रभावित होकर वह सम्राट से प्रियदर्शी हो गए। सार्वभौम धर्म के सर्वप्रथम निरूपण का श्रेय उन्हीं को दिया गया है।

मान्यता है कि लौह धातु का उपयोग सबसे पहले बिहार में ही हुआ था।कई मान्य विद्वान मानते हैं कि प्रथम वैदिक अवधारणा के अनुसार राजगृह के आसपास प्रथम गांव बसा था। शिक्षा के क्षेत्र में नालंदा विश्वविद्यालय में देश-विदेश के छात्र शिक्षा पाते थे। 

प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग सातवीं शताब्दी में नालंदा विश्वविद्यालय में छात्र के रूप में और फिर प्राध्यापक के रूप में कार्यरत  हुए। ह्वेनसांग  की यात्रा वृतांत के अनुसार राजगृह के पूर्वी हिस्से में सुस्वादू चावल पैदा होता था।

अंधेरा घनीभूत था अंग्रेज देश का शासक था। देसी राजा, नवाब सामंत अंग्रेजों के पक्षपाती थे। कई ढंग के शोषण दोहन का तांडव जारी था। उस कालखंड में खासकर पलासी के युद्ध के पूर्व बिहार अलग हुआ करता था। परंतु बक्सर की लड़ाई के बाद बंगाल बिहार और उड़ीसा ईस्ट इंडिया कंपनी के  चले जाने के कारण बिहार सूबा का अस्तित्व समाप्त हो गया और वर्ष 1886 में बिहार प्रेसिडेंसी का हिस्सा बन गया जो 1905 तक बना रहा। 1905 में बंगाल प्रेसिडेंसी से पूर्वी बंगाल अलग कर दिया गया। इस बीच बिहार उड़ीसा और छोटानागपुर बंगाल से अलग करने की घोषणा 12 दिसंबर 1912 को की गई थी जिसकी अधिसूचना 22 मार्च 1912 को निकाली गई थी। इस कारण बिहार दिवस 22 मार्च को मनाया जाता है।

भारतीय स्वतंत्रता के लिए आंदोलन उबड़ खाबड़ रास्तों और दिशाओं के सफर पर था।यह आंदोलन लगभग सौ सालों से जारी था। लेकिन सबों के अर्थात जाति, धर्म, भाषा ,भौगोलिक विविधता वाले समाज को सही लक्ष्य की ओर बढ़ाने के लिए भारतीय राजनीतिक क्षितिज पर एक ऐसा दायित्वमान नक्षत्र का उदय हुआ जिसके अपनी राजनीतिक जीवन की शुरुआत बिहार के चंपारण जिले से हुई। महात्मा गांधी ने आंदोलन में जिन जिन तरीकों का उपयोग चंपारण में किया उन्हीं के सहारे राष्ट्र का नेतृत्व भी उन्हें मिला। लोकमान्य तिलक ने कई दिनों तक मुंबई के एक जज के सामने खड़े होकर जो बहस की थी उसमें उन्होंने ब्रिटिश सरकार को उनके अन्याय के खिलाफ खूब ललकारा था। 

तिलक ने कहा मैं निर्दोष हूं लेकिन एक राजनीतिक और एक सत्याग्रही में फर्क होता है। तिलक ने कहा मैं निर्दोष हूं। उनकी तकनीक दूसरी थी। लेकिन चंपारण के कलेक्टर के पूछने पर कि तुम क्या कहते हो महात्मा गांधी ने कहा था मैं तुम्हारे कानूनों को तोड़ने वाला हूं। तुम मुझे सजा दे सकते हो गांधी जी के इस आशातीत साहस को देखकर बिहार के अंग्रेजी राज के पदाधिकारी कांप उठे थे।

बिहार में स्वतंत्रता आंदोलन में किसान संगठनों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। 1917 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में 1927 से 1929 में स्वामी सहजानंद सरस्वती के द्वारा किसान सत्याग्रह में अंग्रेजी राज समाप्त होने जमीनदारी राज समाप्त होने का शंखनाद किया गया था। स्वतंत्रता आंदोलन के लिए क्रमबद्ध संघर्ष के दौरान 11 अगस्त 1942 को बिहार के सात सपूत गोलीकांड में पटना सचिवालय के सामने शहीद हो गए और 23 हजार स्वतंत्रता सेनानी जेलों में बंद किए गए। आजादी के संघर्ष के समय जहां भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस स्वतंत्रता चाहती थी। वही सुभाष चंद्र बोस, स्वामी सहजानंद सरस्वती किसान मजदूरों को वाजीब हक दिलाना चाहते थे।1947 में भारत आजाद हो गया।

 112 साल बिहार प्रदेश के गठन के बाद 47 साल संघर्षों में व्यतीत हुए और 75 साल नवनिर्माण का काल रहा।आजादी के बाद बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री डॉ श्री कृष्ण सिंह आजादी के संघर्ष काल में 7 साल 10 दिन जेल में रहे थे। 

श्री बाबू के मंत्रिमंडल में अनुग्रह नारायण सिंह, के.बी सहाय जैसे व्यक्तित्व के धनी मंत्री बने थे। श्री बाबू की सरकार ने शोषण पर आधारित जमींदारी प्रथा समाप्त किया।देश का प्रथम रासायनिक खाद कारखाना सिंदरी में स्थापित किया। उत्तर बिहार और दक्षिण बिहार को जोड़ने के लिए गंगा नदी में राजेंद्र पुल निर्माण कराया। डालमिया और बरौनी को औद्योगिक केंद्र बनाया। शिक्षा के विकास के लिए कई विश्वविद्यालय स्थापित किया।

प्राकृतिक आंगन में नेतरहाट स्कूल का निर्माण कराया। वे इस तरह के स्कूल और खोलना चाहते थे‌। जहां पढ़ने वाले विद्यार्थी बिहार के आधारभूत संरचना के प्रति सदा सजग रहे। राष्ट्रभाषा परिषद और हिंदी साहित्य सम्मेलन भवन पटना में स्थापित किया। आजादी के बाद बिहार में प्रथम गैर कांग्रेसी सरकार सत्ता में आई। इस बीच अत्यंत पिछड़ी जाति से आने वाले समाजवादी नेता कर्पूरी ठाकुर कार्यकर्ता प्रधान राजनीति के तहत के रूप में स्मरण किए जाते हैं।

1974 में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में संपूर्ण क्रांति के नाम से जन आंदोलन हुआ मुख्य विषय भ्रष्टाचार मिटाना था। इसके पूर्व डॉ राम मनोहर लोहिया ने सक्रांति का नारा दिया था। 

बिहार समाजवादियों का गढ़ माना जाने लगा। 1974 के जन आंदोलन के कोख से जनता पार्टी का गठन संघ सोशलिस्ट पार्टी संगठन कांग्रेस के मिलने के बाद गठित हुई। डॉ राम मनोहर लोहिया के विचार नामक पुस्तक में जातिवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि शीर्षक लेख में डॉक्टर लोहिया ने लिखा , दूसरी प्रवृत्ति से भी शूद्र समानता हासिल कर सके ऐसा नहीं लगता।इस प्रवृत्ति से शूद्र स्वयं द्विज बन जाने की कोशिश करता है और द्विजों के गुणों के बजाय उसके अवगुण अपनाता है।

जरूरत इस बात की है कि शूद्रों ,पिछड़ों में ऐसा नेता निकले। जिनके पीछे ना सिर्फ शूद्र बल्कि द्विज भी चलने में गौरव अनुभव करें।

112 साल का बिहार में लगातार लोकतंत्र कमजोर पड़ता जा रहा है और धर्मतंत्र प्रभावकारी होते जा रहा है।अब तो करोड़पति ही विधायक, सांसद हो सकते हैं। इसी यक्ष प्रश्न के लिए आत्ममंथन की जरूरत है। कारण सबों के साथ सबों के विश्वास के बिना सब कुछ अधूरा है।

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