जिन खेतों में किया पराली प्रबंधन वहां लहलहा रहे गेहूं के खेत, धान कटनी के समय ही पुआल का बनाया बोझा

जिन खेतों में किया पराली प्रबंधन वहां लहलहा रहे गेहूं के खेत, धान कटनी के समय ही पुआल का बनाया बोझा


विप्र.
नवादा (रवीन्द्र नाथ भैया) 

-पराली प्रबंधन के बाद लहलहा रहे गेहूं के खेत 

-एक टन फसल अवशेष जलाने से 1460 किग्रा. कार्बन वायुमंडल को करता दूषित

-20 किलो बीज कम लगते सामान्य खेती की तुलना प्रति एकड़ पराली प्रबंधन से बुआई में

36 सौ रुपये का प्राप्त हो जाता पशु चारा प्रति एकड़ पराली से

जिले के कई किसान अब पराली प्रबंधन को लेकर जागरूक होने लगे हैं। कल तक जिन फसलाें के अवशेष में आग लगा दी जाती थी वहीं अब उनका लाभ समझ में आने लगा है। धान कटनी के बाद वहीं पराली अब पशुओं के लिए चारा बनी है तो खेतों के लिए प्राकृतिक नाइट्रोजन। 

इन सबमें कृषि विज्ञान केंद्र, कौआकोल के पराली प्रबंधन विज्ञानियों का योगदान मिल रहा है।

अकबरपुर प्रखंड के कझिया गांव में जलवायु अनुकूल कृषि कार्यक्रम के तहत परियोजनाएं चलाई जा रही है। 

इसी के तहत गांव के करीब 150 किसानों ने खरीफ सीजन के अंत में धान कटनी के बाद विशेषज्ञों की सलाह पर पराली प्रबंधन किया। कझिया गांव के किसान मनोज कुमार करीब 26 एकड़ में पराली प्रबंधन के बाद गेहूं की खेती किए हुए हैं। वह बताते हैं कि इस तकनीक में समय से पहले पौधे उग आए।

गेहूं की बालियां अभी से ही पुष्ट हो रही हैं। खेत में पुआल रूपी अवशेष का फायदा यह हुआ है कि खेतों में पर्याप्त नमी बनी हुई है। इससे पौधों का सही वानस्पतिक विकास हो रहा है। 

सामान्य खेती में यही नमी इतने लंबे समय तक नहीं टिक पाता। नमी रहने से जहां पहले चार पटवन करना पड़ता था अब तीन में ही काम चल जा रहा है। 

मनोज बताते हैं कि पराली प्रबंधन से उन पुआल अवशेष जो सड़-गल कर कंपोस्ट बनें उनमें केंचुआ भी पहले की अपेक्षा अधिक रहता है। ये केंचुआ खेती के लिए फायदेमंद होते हैं। ये एक तरह से जैविक खाद प्रदान करते हैं।

धान कटनी के समय ही पुआल का बनाया बोझा:- 

किसान बताते हैं कि हार्बेस्टर से धान की कटनी के समय ही पैडी स्ट्राबेलर मशीन से अवशेष रूपी पुआल का बंडल बनाया गया। इसे पशुओं के लिए चारा के रूप में उपयोग किया जाता है। एक एकड़ में करीब 35 सौ रुपये का चारा मिल गया।

हैप्पी शीडर मशीन से खड़े पराली में ही गेहूं बीज और खाद की एक साथ बुआई कराई गई। इस मशीन का ब्लेड आगे से अवशेष को काटता है और पीछे फार से बुआई खाद के साथ होते जाता है। इसमें पानी डालने के एक सप्ताह के अंदर ही बीज अंकुरित होकर बाहर आ जाता है। पराली प्रबंधन से उन अवशेषों में रहा प्राकृतिक नाइट्रोजन सीधे मिट्टी में मिलकर उत्पादकता बढ़ाता है।

केवीके, सोखोदेवरा के विषय वस्तु विशेषज्ञ (शष्य ) रविकांत चौबे फसल अवशेष (पराली ) से होने वाले नुकसान को बताते हैं। एक टन फसल अवशेष जलाने से करीब 1460 किग्रा. कार्बन डाई आक्साइड वायुमंडल दूषित करता है। इससे 60 किग्रा. तक कार्बन मोनो आक्साइड निकलता है।

इन सबसे वायु की गुणवत्ता प्रभावित होती है। कहते हैं कि पराली का धूंआ मानव स्वास्थ्य पर भी बुरा असर डालता है। सांस की बीमारी, फेफड़ा की बीमारी होती है। 

खेत में पराली जलने से मिट्टी की भौतिक, रासयानिक और जैविक संरचना भी प्रभावित होती है। उर्वरा शक्ति खासकर अवशेष में रहे नाइट्रोजन का बड़ा ह्रास होता है। वह किसानों से पराली प्रबंधन को लेकर जागरूक होने को कहते हैं।

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