नवाजगढ़ मैदान में आयोजित विराट शिव शिष्य महोत्सव में बहा आस्था और भक्ति का जनसैलाब, करीब एक लाख शिव शिष्यों ने लिया भाग - Virat Shiv Shishya Mahotsav

नवाजगढ़ मैदान में आयोजित विराट शिव शिष्य महोत्सव में बहा आस्था और भक्ति का जनसैलाब, करीब एक लाख शिव शिष्यों ने लिया भाग - Virat Shiv Shishya Mahotsav


नवादा (रवीन्द्र नाथ भैया)
जिले के वारिलीगंज नगर परिषद के नवाजगढ़ मैदान में  शिव शिष्य हरिद्रानंद फाउंडेशन द्वारा विराट शिव शिष्य महोत्सव का आयोजन किया गया। 

कार्यक्रम में शेखपुरा, बरबीघा, जमुई, बाढ़, बख्तियारपुर, झारखंड, पश्चिम बंगाल आदि स्थानों से करीब एक लाख शिव शिष्यों ने पूर्ण श्रद्धा भक्ति के साथ उत्साहपूर्वक भाग लिया। लगा मानों आस्था और भक्ति का जनसैलाब उमड़ हो। चारों तरफ शिव शिष्यों की भीड़ ही भीड़ नजर आ रही थी। हजारों की संख्या में लोग कार्यक्रम में भाग लेने आये थे। भीड़ स्वानुशासित थी। 

शिष्य परिवार के संस्थापक पूज्य हरिद्रानंद जी के बड़े सुपुत्र अर्चित आनंद ने शिव शिष्य, एक आध्यात्मिक उत्कर्षक विषय पर चर्चा की। भैया अर्चित आनंद ने कहा कि यह अवधारणा पूर्णतः आध्यात्मिक है, जो भगवान शिव के गुरु स्वरूप से एक व्यक्ति के सिद्धांत से संबंधित है। उन्होंने कहा कि शिव के शिष्य एवं शिष्य अपने सभी आयोजनों में शिव गुरु हैं और संसार का एक व्यक्ति उनके शिष्य हो सकते हैं, इसी तरह सामने आते हैं। 

उन्होंने कहा कि शिव गुरु हैं, यह कथन बहुत पुराना है। भारत के अधिकांश लोग इस बात को जानते हैं कि भगवान शिव गुरु हैं, आदि गुरु और जगत गुरु हैं। हमारे साधुओं, शास्त्रों और मनीषियों द्वारा महेश्वर शिव को आदि गुरु, परम गुरु आदि विभिन्न स्तरों से विभूषित किया गया है।


शिव शिष्य साहेब हरिद्रानंद जी के संदेश को लेकर आई कार्यक्रम की मुख्य वक्ता और साहेब जी की बड़ी पुत्रबधु बहन बरखा आनंद ने प्रथम मकर संक्रांति उत्सव की महत्ता के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि शिव केवल नाम के हैं, लेकिन काम के गुरु नहीं हैं। शिव के औघड़दानी स्वरूप से धन, धान्य, संत, धन आदि का व्यापक अर्थ है तो उनका प्राप्त गुरु स्वरूप से ज्ञान भी क्यों नहीं प्राप्त हुआ? किसी भी संपत्ति या संपत्ति के उपयोग के ज्ञान की कमी घातक हो सकती है।

दीदी बरखा आनंद ने कहा कि शिव जगत गुरु हैं। इसलिए जगत का एक व्यक्ति यह चाहता है कि वह किसी भी धर्म, जाति, संप्रदाय, लिंग का हो, शिव को अपना गुरु बना सके। शिव का होना शिष्य के लिए किसी पारंपरिक नैतिकता या दीक्षा की आवश्यकता नहीं है। केवल यही विचार है कि शिव मेरे गुरु हैं, शिव के शिष्य की स्वयं की शुरुआत होती है। इसी का विचार यह है कि हम आपको शिव के शिष्य बनाते हैं। बता दें कि सोमवार 15 जनवरी को उनका जन्मदिन भी था।

मान्यता है कि शिव शिष्य साहेब हरिद्रानंद जी ने 1974 में शिव को अपना गुरु माना था। 1980 के दशक तक शिव के शिष्यों की अवधारणा भारत में विभिन्न स्थानों पर व्यापक रूप से प्रदर्शित की गई। उनके शिव शिष्य साहेब हरिद्रानंद जी और धर्मपत्नियों की जाति, धर्म, लिंग, वर्ण, संप्रदाय आदि से परे मानव गुणों को भगवान शिव के गुरु स्वरूप से जोड़ने की मांग की गई।

प्रथम शिव शिष्यों द्वारा शिवनाम संकीर्तन के द्वितीय शिव शिष्य परिवार के निर्जीव राधाकृष्ण आगमन ने आगतों का स्वागत किया। 


शेखपुरा के आरपी सिंह ने महोत्सव के उद्देश्य पर प्रकाश डाला। शिव शिष्याओं द्वारा हमारे गुरु शिव - एक भावना का 7 मिनट का कार्यक्रम पेश किया गया। 

रांची से आए शिव कुमार ने शिव शिष्य के तीन सूत्र प्रकाश में डाले। सोमेन्द्र कुमार झा, रांची ने जगत गुरु शिव के शिष्यों की पृष्ठभूमि, प्रसार प्रसार पर विस्तृत चर्चा की। शिव शिष्यों द्वारा भजन की पुजारियों को पुनः आरंभ किया गया। सुरेश प्रसाद सिंह ने निर्दिष्टीकरण दिया।

महोत्सव को सफल बनाने में शिव शिष्य परिवार के अंतिम समूह राधाकृष्ण सम्राट, आयोजन समिति के अध्यक्ष विश्वनाथ चंद्रा, मनीषा मालाकार, पिंकी, अल्पना, उड़ीसा, दीप नारायण, अरविंद, भगवान राय (सहरसा), शशि शेखर आदि का विशेष योगदान रहा।

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